नकली मौत से अपनी नीरस बोरियत-भरी ज़िंदगी को बृज मोहन ने रंगीन बना तो दिया था, लेकिन केवल तब तक के लिए जब तक कि उसे अपने ही खून के लिए फाँसी की सज़ा नहीं सुनाई गयी.
नकली मौत से अपनी नीरस बोरियत-भरी ज़िंदगी को बृज मोहन ने रंगीन बना तो दिया था, लेकिन केवल तब तक के लिए जब तक कि उसे अपने ही खून के लिए फाँसी की सज़ा नहीं सुनाई गयी.